भारत को मिला एनएसजी-एमटीसीआर में अमेरिका का समर्थनBookmark and Share

PUBLISHED : 08-Jun-2016



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को वाशिंगटन यात्रा के दूसरे दिन व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात की। बैठक के बाद ओबामा ने कहा कि संवेदनशील तकनीक हस्तांतरण के लिए अमेरिका एनएसजी और एमटीसीआर में भारत के शामिल होने का समर्थन करेगा।

पीएम मोदी ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) और मिसाइल तकनीक नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) सदस्यता के लिए अमेरिकी समर्थन के लिए ओबामा का धन्यवाद दिया। मोदी ने कहा कि दोनों देश असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में और सहयोग बढ़ाएंगे और उम्मीद जताई कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा के लिए जरूरी तकनीक और निवेश हासिल हो सकेगा। प्रधानमंत्री ने परमाणु सुरक्षा, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन क्षेत्र में दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि भारत की 80 करोड़ की युवा शक्ति अमेरिका के साथ मिलकर मानवता के कल्याण के लिए काम करेगी। पीएम ने कहा कि जी-20 में वह फिर ओबामा के साथ मिलेंगे।

वहीं, ओबामा ने कहा कि भारत को तकनीक की जरूरत है और हम एनएसजी में उसका समर्थन करेंगे। ओबामा ने तीन अन्य निर्यात नियंत्रण व्यवस्था ऑस्ट्रेलिया समूह, एमटीसीआर और वासेनार समझौते में भारत की सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया। इससे भारत को अमेरिका से सैन्य ड्रोन और अन्य उच्च तकनीकी मिसाइलें हासिल करने में मदद मिलेगी।

एमटीसीआर का राह आसान
एमटीसीआर समूह की अगली बैठक सितंबर में होनी है। पिछली बार नौसैनिकों के मुद्दे को देखते हुए इटली ने अड़ंगा लगा दिया है। चूंकि अब यह मुद्दा हल हो गया है, ऐसे में भारत समूह में शामिल हो जाएगा।

एनएसजी के लिए अमेरिका-जापान जुटे
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी इस समय चीन में हैं, संभवत: भारत की एनएसजी सदस्यता पर भी वह चर्चा करेंगे। भारत में जापान के राजदूत केंजी हिरामत्सु ने भी कहा कि उनका देश एनएसजी मुद्दे पर भारत की पूरी मदद करेगा।

मनमोहन ने डाली थी एनएसजी क्लब के लिए नींव
एनएसजी में भारत की सदस्यता की नींव उस वक्त पड़ी थी, जब 18 जुलाई 2005 को भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु करार (123 समझौता) हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इस समझौते पर दस्तखत किए थे। इसके तहत एनपीटी-सीटीबीटी पर हस्ताक्षर किए बिना अमेरिका भारत के साथ परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग पर राजी हुआ।
इसके तहत भारत ने अपने सैन्य और असैन्य परमाणु संयंत्रों को अलग किया और असैन्य परमाणु संयंत्रों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी द्वारा निरीक्षण के लिए सहमत हुआ। जबकि एनएसजी ने भारत के लिए विशेष छूट का प्रस्ताव पारित किया। मनमोहन ने प्रधानमंत्री रहते हुए आठ बार अमेरिकी दौरा किया था। जबकि मोदी का पिछले दो साल के कार्यकाल में चौथा दौरा है।

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