बच्चों को रखना चाहती हैं स्ट्रेस फ्री तो जीवन में ये बदलाव हैं बेहद जरूरीBookmark and Share

PUBLISHED : 02-Mar-2020



वो कहते हैं ना कि मां का असर तो बच्चे पर पड़ेगा ही। फिर आप यह क्यों नहीं समझ रही हैं कि आपका तनाव बच्चे की जिंदगी पर भी तो असर डालेगा। कैसे अपने तनाव के इस जाल में बच्चे को फंसने से बचाएं, बता रही हैं
सुमन बाजपेयी  

मीता जब स्कूल में पढ़ती थी तो स्कूल में उसे हमेशा दूसरे बच्चे किसी न किसी बात पर चिढ़ाया करते थे। उसका असर यह हुआ है कि आज तक जब भी वह किसी फंक्शन में जाती है तो उसे यही डर लगा रहता है कि कोई उसका मजाक न उड़ा दे। बात यहीं तक सीमित नहीं रही। जब मीता की बेटी पहले दिन स्कूल जाने लगी तो मीता ने अपनी बेटी से कहा, ‘अगर तुम्हारा कोई मजाक उड़ाए या तंग करे, तो सीधा टीचर से जाकर उसकी शिकायत करना।’
वह नन्ही-सी बच्ची तब तक इन बातों को न तो जानती होगी या ना कभी सोचा होगा कि ऐसा भी कुछ हो सकता है, लेकिन मां की बात सुनने के बाद वह निश्चित रूप से इन स्थितियों पर गौर करेगी और खुद चीजों को संभालने की बजाय मां की सीख पर चलेगी। वह हर उस छोटी-छोटी बात की शिकायत टीचर से करेगी, जो उसके हिसाब से नहीं होगी। धीरे-धीरे ऐसा करना उसका स्वभाव बन जाएगा।

अपने तनाव पर काबू न कर पाना और दूसरे बच्चों के सामने किसी न किसी तरह से उसे व्यक्त कर देने के डर से उस छोटी-सी बच्ची के मन में तनाव इकट्ठा होने लगेगा। आप विश्वास करें या न करें, पर इस तनाव का पहला बीज बच्ची के मन में बोने का काम उसकी मां ने ही किया।

जॉन हॉपकिन्स चिल्ड्रेन्स सेंटर द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, इस बात की काफी आशंका होती है कि एंग्जाइटी या तनाव से जूझ रहे अभिभावकों के बच्चों को भी इसी तरह की समस्या से जूझना पड़े। अभिभावक जाने-अनजाने में अपना तनाव बच्चे की जिंदगी में ट्रांसफर कर देते हैं। अगर आप चाहती हैं कि आपकी जिंदगी के इस पक्ष की परछाई भी आपके बच्चे के भविष्य पर न पड़े, तो आपको अपनी जिंदगी में जरूरी बदलाव लाने होंगे।

खुद में लाएं जरूरी बदलाव-
अकसर माता-पिता को हम कहते सुनते हैं... संभलकर चलो, पानी में गिर जाओगे। सड़क के किनारे-किनारे चलो, वरना एक्सीडेंट हो सकता है। वह चीज मत छूओ, वरना बीमार हो जाओगे। इतने ऊंचे मत चढ़ो, नीचे गिरोगे। न जाने ऐसे कितने डर हम बच्चे के अंदर अनजाने में भरते चले जाते हैं। हो सकता है वे आपके बचपन के डर हों, जिनसे आप बच्चे को बचाना चाहती हों। बच्चे को समझाना सही है, पर तरीका अलग हो सकता है। जैसे आप बच्चे को कह सकती हैं... सड़क के किनारे-किनारे आराम से चलो, भागने की जरूरत नहीं। मजे से खेलो और घर आकर हाथ धो लेना। वाह, तुम तो कितने ऊंचा चढ़ सकते हो, बस संतुलन का ध्यान रखना। बच्चे आपको देखकर आपकी बातें सुनकर सीखते हैं। अगर आपके ही चेहरे पर हमेशा परेशानी के भाव  रहेंगे, तो बच्चा कैसे उस घबराहट से खुद को बचा पाएगा?

अपनी परेशानियां, काम का बोझ, चिंता और खुद की भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाने के कारण बेवजह बच्चों पर झुंझलाना, माता-पिता के लिए आम बात है। डॉ. समीर पारिख, डायरेक्टर, मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज, फोर्टिस हेल्थकेयर कहते हैं, ‘बच्चे आपके चेहरे पर आए भावों, बॉडी लैंग्वेज और शब्दों से तुरंत जान लेते हैं कि उनकी मां परेशान है। आप उनके लिए सबसे बड़ा संबल होती हैं, एक चट्टान की तरह, जिस पर वे बिना हिचके भरोसा करते हैं। वे आपको चिंतित नहीं देख सकते हैं। बेहतर तरीके से अपने तनाव को मैनेज करना सीखकर आप अपने साथ-साथ बच्चे की भी मदद कर सकती हैं।’

बच्चे पेरेंट्स से ही सीखते हैं कि किसी जटिल स्थिति से कैसे निकलना है। वे पेरेंट्स से ही अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं, लेकिन जब वे अपने पेरेंट्स को हमेशा तनाव में देखते हैं तो खुद ही तय कर लेते हैं कि फलां-फलां स्थितियां असुरक्षित हैं या इनसे बचकर रहना चाहिए। बच्चे को तनाव से बचाना है तो पहले आपको तनाव से डील करने की तरकीब विकसित करनी होगी।

मुश्किलें खड़ी न करें-
जब तक बच्चा खुद किसी समस्या के बारे में आपसे बात न करे, तब तक उसे भविष्य में आने वाली चुनौतियों या आपने जो झेला हो, उस आधार पर डराएं नहीं। जरूरी है कि हर तरह की भावना से बच्चे का परिचय करवाया जाए और यह भी सुनिश्चित करें कि वह ठीक ढंग से अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सके। पेरेंट्स बच्चे को भविष्य में आनेवाली परेशानियों से बचाने के लिए कुछ ऐसा बोल जाते हैं, जो उन पर नकारात्मक असर डालता है। उनका इरादा तो सही होता है, पर बच्चे पर असर गलत पड़ता है। आप बाहर जाती हैं और रास्ते में कोई जानवर दिख जाता है तो तुरंत आपकी प्रतिक्रिया होती है, यह डरावना है, हमला भी कर सकता है।

बच्चे के लिए वह जानवर डर का पर्याय बन जाता है। इसकी बजाय कहा जा सकता है, यह जानवर थोड़ा अजीब है या फिर इसे देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। अगर बच्चा कहता है कि उस जानवर को देखकर वह डर गया तो आप कह सकती हैं कि हां, मुझे भी डर लगा। बच्चे को पहले से ही डरा देना उनके व्यक्तित्व को गलत आकार दे सकता है।

ब्रेक ले लें-
डॉ. पारिख कहते हैं कि बच्चे के साथ अपनी भावनाओं को साझा करना गलत नहीं, लेकिन उन्हें अपना तनाव देना गलत है। अगर आपको महसूस होने लगा है कि आप बहुत ज्यादा तनाव में रहने लगी हैं तो कुछ वक्त के लिए अपने काम से ब्रेक ले लें।

अपना रुटीन बदलें। जब आप अपने तनाव को मैनेज करना सीख लेंगी, तो बच्चा खुद-ब-खुद तनाव को मैनेज करने की तरकीब आपको देखकर सीख लेगा। यह संभव नहीं है कि आप तनाव से गुजर रही हों और बच्चे को शांत व सहज रहने का गुर सिखाएं। बेहतर यही होगा कि अपनी बंधी-बंधाई जिंदगी से थोड़ा बेक्र लें। आप किसी मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की मदद भी ले सकती हैं। एक्सपर्ट की मदद से एक तरफ आप जहां अपने तनाव को मैनेज कर पाएंगी, वहीं बच्चे को भी अपने व्यवहार को समझने व संभालने में सहयोग दे पाएंगी।

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट तान्या मेहरा कहती हैं, ‘बच्चा एक स्पंज की तरह होता है, जो तुरंत हर चीज को ग्रहण करता है। बच्चे के सामने अपने चेहरे पर आने वाले भावों को लेकर सतर्क रहें। आप तनाव में नहीं हैं, आपके यह कहने भर से बच्चा मान नहीं लेगा कि आप ठीक हैं। बच्चे के सामने अपनी भावनाओं को छुपाने से बचें।’

अपनी काबिलीयत पर करें विश्वास-
बच्चे की घबराहट को देखकर या उसे तनाव में देखकर अपनी परवरिश पर शक करने की गलती नहीं करें। यह बात हमेशा दिमाग में रखें कि आपकी परवरिश में कोई कमी नहीं है। आप खराब या नाकामयाब पेरेंट नहीं हैं। बच्चे की चिंता, परेशानी व दुविधाओं को दूर करते हुए खुद शांत व तनावमुक्त बनी रहें।
साभार

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