सावधान! बढ़ रहा है तनाव, जानिए क्या है Homeostasis और इससे कैसे बचेंBookmark and Share

PUBLISHED : 10-Aug-2019



दुनियाभर में तनाव के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। लंबे समय तक तनाव का रहना तन और मन दोनों को बीमार बना रहा है। संभलने की बात यह है कि तनाव का यह संक्रमण तेजी से बढ़ता हुआ पास वालों को भी शिकार बनाने लगता है। तनाव से क्यों और कैसे बचें, बता रही हैं शमीम खान

आज हमने अपने जीवन में तनाव के अनेक कारण पैदा कर लिए हैं। तनाव बढ़ता जा रहा है, साथ में रोग भी। डॉक्टरों का मानना है कि ऐसे 90 प्रतिशत मरीज तो अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए खुद ही जिम्मेदार होते हैं। जब मस्तिष्क को पूरा आराम नहीं मिल पाता और उस पर हमेशा एक दबाव बना रहता है, तो समझिए कि तनाव हावी हो रहा है। तनाव को बीसवीं सदी के सिंड्रोम की संज्ञा दी जाती है।  मेडिकल की भाषा में तनाव यानी शरीर के होमियोस्टैसिस में गड़बड़ी। यह वह अवस्था है, जो किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक कार्यप्रणाली को गड़बड़ा देती है।

स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है तनाव
शोध बताते हैं कि तनाव के दौरान शरीर में कई शारीरिक और जैविक बदलाव होते हैं। शरीर में कई हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिनमें एड्रेनलिन और कार्टिसोल प्रमुख हैं। इनकी वजह से दिल का तेजी से धड़कना, पाचन क्रिया का मंद पड़ जाना, रक्त का प्रवाह प्रभावित होना, सिर दर्द रहना, नर्वस सिस्टम की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाना और इम्यून सिस्टम का कमजोर होना जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। लगातार तनाव यानी क्रॉनिक स्ट्रेस का शरीर पर बुरा असर पड़ता है, जैसे...

- प्री-एजिंग: जो लोग अधिक तनाव में रहते हैं, उनमें बुढ़ापे के लक्षण  प्रकट होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। शरीर स्ट्रेस हार्मोन बनाता है, जिससे शरीर में जैविक बदलाव होने लगते हैं।  तनाव के दौरान नींद, खान-पान व शारीरिक सक्रियता पर बुरा असर पड़ता है, जिससे असमय बुढ़ापा आने लगता है।
- अस्थमा: तनाव, अस्थमा को शुरू कर सकता है। अस्थमा के लक्षण गंभीर हो सकते हैं। जो माता-पिता अधिक तनाव लेते हैं, उनके बच्चों में दमा
होने की आशंका बढ़ जाती है।  
- पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं: हमारा पाचन तंत्र हमारी भावनाओं के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। लगातार तनाव रहने से पेट में मरोड़ रहना, पेट फूलना, सूजन, भूख न लगना, अपच आदि की समस्या रहती है। तनाव पाचक रस (हाइड्रोक्लोरिक एसिड) के स्राव को ट्रिगर करता है, इसकी अधिक मात्रा पेट की भीतरी परत और पाचन मार्ग को नुकसान पहुंचाती है और अल्सर का खतरा बढ़ता है। 
- हृदय रोग: तनाव की स्थिति में हृदय की धड़कनें तेज हो जाती हैं और रक्त का प्रवाह भी बढ़ जाता है। अचानक होने वाले भावनात्मक तनाव से हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। जिन्हें पहले से ही हृदय संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें तनाव से बचना चाहिए। शोध कहते हैं कि तनाव दिल के रोगों की आशंका को 15-20 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।
- उच्च रक्तदाब :  तनाव से रक्त नलिकाएं संकुचित हो जाती हैं, जिससे रक्तदाब बढ़ जाता है। लगातार बीपी हाई रहने से स्ट्रोक का खतरा बढ़
जाता है।
- रोग प्रतिरोधी प्रणाली का कमजोर हो जाना: तनाव के कारण इम्यून तंत्र की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाती है। इम्यून तंत्र, एंडोक्राइन सिस्टम (अंत:स्त्रावी तंत्र) से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होता है, इसलिए हार्मोन का स्राव भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है।
- अनिद्रा:  तनाव, मस्तिष्क को शांत नहीं होने देता, इससे नींद से जुड़ी समस्याएं रहने लगती हैं। दिमाग  पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाता, जिससे सोचने की क्षमता, पर असर पड़ता है।
- अवसाद : लंबे समय का तनाव मस्तिष्क के उन रसायनों को परिवर्तित कर सकता है, जो मूड को नियंत्रित करते हैं। अधिक तनाव लेने वालों के अवसाद की चपेट में आने की आशंका 80 फीसदी तक बढ़ जाती है। कई मानसिक रोगों की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है।
- डिमेंशिया: लगातार तनाव की स्थिति मस्तिष्क की कोशिकाओं और हिप्पोकैम्पस को नष्ट कर देती है। यह याददाश्त वाला हिस्सा है, इस पर बुरा असर पड़ने से डिमेंशिया होने का खतरा बढ़ जाता है।

कैसे बचें तनाव से
- किसी समस्या को नाटकीय रूप ना दें।
-  हर समस्या का कोई न कोई समाधान होता है। खुद से समाधान नहीं कर पा रहे हैं तो किसी नजदीकी की मदद लें।
- तनाव में हर चीज काफी मुश्किल और बड़ी लगती है। बुरी चीजें सभी के साथ होती हैं, सिर्फ आपके साथ नहीं। इसलिए तनाव में भी सामान्य और सकारात्मक रहने की कोशिश करें।
- ना कहना सीखें, अगर आप कोई काम अच्छी तरह नहीं कर सकते या वह आपकी जिम्मेदारी नहीं है तो स्पष्ट रूप से ना कहें।
- 6-8 घंटे की  नींद लें। सोने से एक घंटा पहले अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल को बंद कर दें। नियमित समय पर सोएं।
- शराब और कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन कम करें या ना करें।
- रोज कम से कम दस मिनट ध्यान करें। ध्यान से मस्तिष्क में उन रसायनों का स्राव  होता है, जो उसे शांत रखते हैं।
- संतुलित और पोषक भोजन खाएं। आहार में  फल, सब्जियां, सूखे मेवे, साबुत अनाज और डेयरी उत्पाद शामिल करें।
- दिन में तीन बार पेट भर खाने की बजाय छह बार थोड़ा-थोड़ा खाएं, ताकि खून में शुगर का कम स्तर आपके मूड को प्रभावित न करे।
- शरीर में पानी की कमी हमारी मानसिक ऊर्जा और क्षमता को कम करती है, इसलिए प्रतिदिन 8-10 गिलास पानी पिएं।
- प्रतिदिन नियत समय पर ही खाना खाएं, इससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
- घर या कार्यालय के पास किसी पार्क में नियमित टहलें।
- अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं।
- अगर तनाव की स्थिति अधिक समय तक बनी रहे तो डॉक्टर से संपर्क करें।

कैसे करें तनाव का प्रबंधन
मेडिटेशन है फायदेमंद
अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी ने मेडिटेशन के लिए ‘मेडिटेशन इज मेडिसिन’ शब्दावली का उपयोग किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिटेशन सतर्कता और एकाग्रता बढ़ाता है, याददाश्त सुधारता है और दर्द के अहसास को कम करता है। इसके अलावा मेडिटेशन और डीप ब्रीदिंग तनाव को दूर रखने या उसे काबू रखने में मददगार होते हैं।

तनाव से निपटने के लिए सही उपायों को चुनें
- अच्छे वाक्य दोहराएं। किसी शांत स्थान पर आंखें बंद करके गहरी सांस लें। जब भी सांस छोड़ें ‘सब ठीक है’, ‘जो होगा अच्छा होगा’ जैसे वाक्य दोहराएं। ऐसा लगभग दस मिनट करें। मेडिकल आधार पर भी साबित हो चुका है कि यह तकनीक कार्य करती है।
- संगीत को बनाएं साथी। संगीत से हृदय की धड़कनों, रक्तदाब और रक्त में तनाव पैदा करने वाले हार्मोनों का स्तर कम होता है। ब्रेक लें और अपना मनपसंद संगीत सुनें।
- मालिश से तनावग्रस्त मांसपेशियों को आराम मिलता है। रक्त संचार में सुधार होता है।
-  किसी शांत प्राकृतिक स्थान पर घूमने जाएं। हंसना तनाव कम करता है और शरीर को अगले 45 मिनट तक तनाव रहित रखता है।

प्रोग्रेसिव रिलैक्सेशन तकनीक अपनाएं
जब आप अधिक तनावग्रस्त अनुभव करें, तो प्रोगेसिव रिलैक्सेशन तकनीक अपनाएं। किसी आरामदायक स्थान पर शांत होकर बैठ जाएं या लेट जाएं। अपनी आंखें बंद कर लें। अब 10 सेकेंड के लिए अपने पैर की उंगलियों को जितनी कठोरता/कड़ाई से आप कर सकते हैं, अंदर की ओर मोड़ें। फिर उन्हें ढीला छोड़ दें। अपने पैर की उंगलियों के बाद, आप अपने पंजों, टांगों, पेट, उंगलियों, बांहों, गर्दन और चेहरे को तानें और फिर ढीला छोड़ दें। इस तकनीक के द्वारा तनाव को पैर की उंगलियों से लेकर सिर तक होते हुए बाहर निकल जाने दें।

50 फीसदी, महानगरों में रहने वालों में से, अपनी नींद पूरी नहीं कर पाते। पहले तनाव अनिद्रा को बढ़ाता है, फिर अनिद्रा तनाव को।
15 से 17 फीसदी एजिंग की प्रक्रिया तनाव की अधिकता से  बढ़ रही है।
48 फीसदी क्लिनिकल स्ट्रेस के मामले बढ़े हैं पिछले दो दशकों में।
2 गुना एंग्जाइटी का शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है, लंबे समय तक तनावग्रस्त रहने वाले लोगों में।
2030 तक दुनिया में आत्महत्या  मृत्यु का दूसरा बड़ा कारण बन जाएगी। आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह अवसाद है।

हमारे विशेषज्ञ : डॉ. विकास गुप्ता, निदेशक, न्यूरो सर्जरी, मणिपाल हॉस्पिटल, द्वारका, दिल्ली
डॉ. रमन कुमार, अध्यक्ष, एकेडमी ऑफ फैमिली फिजिशियंस ऑफ इंडिया, दिल्ली
(livehindustan.com)
 

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