3डी बायोप्रिंटिंग जगा रही उम्मीदें, मानव अंगों के लिए खत्म हो सकती है वेटिंग लिस्ट, जानिए कैसेBookmark and Share

PUBLISHED : 04-Oct-2019



 अगर गाड़ी का कोई पुर्जा खराब होता है, तो हम स्पेयर पार्ट ले लेते हैं। नया पुर्जा लगते ही गाड़ी फिर सरपट दौड़ने लगती है। क्या इंसान के जिस्म के पुर्जे भी ऐसे मिलने लगेंगे? 3डी बायोप्रिंटिंग के क्षेत्र में जिस तरह सफलता मिल रही है उसे देखते हुए तो यही लगता है। 

3डी प्रिंटिंग क्या है

3डी या थ्री डायमेंशनल प्रिंटिंग में लंबाई, चौ़ड़ाई, ऊंचाई और गहराई में से तीन आयामों को लेकर किसी ठोस वस्तु (सॉलिड ऑब्जेक्ट्स) का डिजाइन कंप्यूटर पर तैयार किया जाता है और डिजाइन के मुताबिक अलग-अलग लेयर्स में उन्हें जोड़कर वस्तु का निर्माण किया जाता है। आमतौर पर 3डी प्रिंटर प्लास्टिक का उपयोग करते हैं, क्योंकि इसका उपयोग आसान और सस्ता है। कुछ 3डी प्रिंटर अन्य सामग्री जैसे धातु और सिरैमिक के साथ भी 3डी प्रिंट कर सकते हैं। मेडिकल फील्ड को इस किस्म की 3डी बायोप्रिंटिंग से काफी उम्मीदें हैं क्योंकि विभिन्न देशों में इस तकनीक के जरिये मानव अंगों का निर्माण करने के प्रयासों को सफलता मिल रही है।

3डी बायोप्रिंटिंग का विकास

3डी बायोप्रिंटिंग बहुत तेज गति से बढ़ रही है। इस गति के लिहाज से मानव अंग हासिल करने के लिए प्रतीक्षा सूची अब बीते समय की बात हो जाएगी। अमेरिका स्थित एक मार्केट रिसर्च कंपनी 'ग्रैंड व्यू रिसर्च इन्कॉरपोरेशन" के अनुसार वर्ष 2026 तक 3डी बायोप्रिंटिंग का बाजार 4.1 अरब डॉलर का हो जाएगा। इजरायली वैज्ञानिकों ने बायो-प्रिंटिंग से ऐसा मानव हृदय तैयार किया है जिसमें सभी कोशिकाएं, रक्त वाहिनियां, वेंट्रीकल्स और चेम्बर्स हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि 3डी बायोप्रिंटिंग क्या है? और अगर यह इसी गति से बढ़ती रही तो उसका मानव के स्वास्थ्य और हृदय रोग पर क्या असर होगा?

बड़ी उम्मीद जगा रही 3डी प्रिंटिंग

3डी प्रिंटिंग ने अपने संक्षिप्त इतिहास में तेजी से सफर किया है- जिसका चिकित्सा जगत पर स्पष्ट प्रभाव है। वर्ष 1983 में चार्ल्स हल ने एक छोटा काला अंजन (आईवाश) कप 3डी प्रिंट किया। यह दुनिया की पहली 3डी प्रिंटेड चीज थी। वर्ष 1986 में उन्होंने अमेरिका के साउथ कैरोलिना में इस टेक्नोलॉजी यानी स्टीरियोलिथोग्राफी को पेटेंट करवाया और 3डी सिस्टम बनाया। महज 13 वर्ष बाद, 1996 में टेक्सस के सर्जन ने अमेरिका के विल्फोर्ड हाल मेडिकल सेंटर में हल की कंपनी की इस तकनीक का उपयोग करके जुड़वा का मॉडल बनाया। इस मॉडल का उद्देश्य था कि इन दोनों को अलग करने की रणनीति बनाने में सफलता पाई जाए। आखिर में, सर्जन इसे करने में सफल हुए और प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों बच्चे चल सकने के योग्य थे। तभी से वैज्ञानिकों ने 3डी बायोप्रिंटिंग का उपयोग स्टंट और स्प्लिंट बनाने में किया, जो अब व्यावसायिक रूप से चलन में हैं।

वर्ष 2002 में वैज्ञानिक एक छोटी किडनी बनाने में सफल रहे। अब महज 17 वर्ष बाद, वैज्ञानिकों ने हृदय के प्रिंट में सफलता प्राप्त की है। हालांकि इसका आकार खरगोश के हृदय के आकार का है लेकिन इस सफलता में बहुत व्यापक संभावनाएं छिपी हैं और यह मानव के सुप्रयोग का अद्भुत नमूना है।

यह कैसे काम करता है?

फ्रीडम रिवर्सिबल इम्बेडिंग ऑफ सस्पेंडेड हाइड्रोजेल्स, संक्षेप में 'फ्रेश" बायोप्रिंटिंग की सबसे लोकप्रिय तकनीक के रूप में 3 डी इमेजिंग का उपयोग करके काम करती है। एमआरआई या सीटी स्कैन से उस अंग की 3 डी इमेज निकल आती है जिसे प्रिंट करना होता है। इसके बाद वैज्ञानिक जैविक मटेरियल जैसे अल्जीनेट, कॉलेजन, जिलेटिन, हायल्यूरोनिक एसिड की मदद से अन्य किसी भी अंग का प्रिंट बनाते हैं।


बायोप्रिंटेड हार्ट में मिली सफलता

बायोप्रिंटेड हार्ट इस बात का प्रमाण है कि इस प्रक्रिया द्वारा वैज्ञानिकों ने किस तरह की जटिलता पर भी विजय प्राप्त कर ली है। सीन वी. मर्फी और एंथोनी अटला इसे '3डी बायोप्रिंटिंग ऑफ टिश्यूज एंड ऑर्गंस" शीर्षक से लिखे आलेख में बहुत खूबसूरती से बताते हैं। यह लेख अगस्त 2014 में 'नेचर बायोटेक्नोलॉजी" में आया है। उन्होंने लिखा है, '3डी बायोप्रिंटिंग में बायोलॉजिकल मटेरियल, बायोकेमिकल्स और जीवित कोशिकाओं की परत दर परत बहुत सूक्ष्मता से पोजिशनिंग की जाती है। यह इनके क्रियाशील हिस्सों पर पूरे त्रिविमीय नियंत्रण के साथ की जाती है और इसके सहारे 3-डी ढांचा खड़ा हो जाता है। 3 डी बायोप्रिंटिंग के कई तरीके हैं जिनमें बायोमिमिक्री, ऑटोनोमस सेल्फ असेंबली और बिल्डिंग ब्लॉक्स शामिल हैं।"

बायोमिमिक्री में किसी भी अंग के सूक्ष्म वातावरण की बारीक से बारीक समझ का ख्याल रखा जाता है और उसी के अनुरूप बिल्कुल उसी तरह का अंग तैयार किया जाता है। ऑटोनोमस सेल्फ-असेंबली में किसी भी तरह के अन्य आयाम का उपयोग नहीं किया जाता है। इसके बजाय यह एम्ब्रयोनिक ऑर्गन डवलपमेंट से चलता है ताकि सेलुलर स्फेरॉयड्स बना सके, जो आपस में जुड़क वांछित अंग बनाते हैं। अंतत: 'मिनी टिश्यू" तकनीक में हर अंग को बहुत बारीक-बारीक हिस्सों में तोड़ा जाता है और फिर उन छोटे-छोटे हिस्सों के प्रिंट निकाले जाते हैं। ये 'बिल्डिंग ब्लॉक्स" आपस में जुड़कर एक डिजाइन की रचना करते हैं।

इनमें से हर तरीके में वैज्ञानिक अलग-अलग तरह के बायोलॉजिकल मटेरियल का उपयोग करते है।

3डी बायोप्रिंटिंग बायोलिंक का उपयोग करके नए ऊतक का प्रिंट निकालती है। यह बायोलिंक जीवित कोशिकाओं और बायोपॉलीमर जैल से बनी होती है जो एक मॉलीक्यूलर आधार देने का काम करती है। बायोपॉलीमर जैल बहुत तेजी से घुल कर एक द्रव में बदल जाता है और क्रॉसलिंकिंग के जरिए नेटवर्क बनाता है- ये नेटवर्क ही किसी भी अंग के लिए प्रमुख आधार बनते हैं। एक जीवित अंग बनाने के लिए जरूरी है कि इसे एक कोशिकीय वातावरण में मिलाना जरूरी होता है। इसके लिए वैज्ञानिक मरीज के रक्त से हीमेटोपोएटिक स्टेम सेल्स (ऐसी स्टेम सेल्स जो रक्त कोशिकाओं का निर्माण कर सकें) लेते हैं और उन्हें अलग-अलग तरह की रक्त कोशिकाओं की संतति पैदा करने का मौका देते हैं। इन बायो-इंक को परत दर परत इकट्ठा करके वैज्ञानिक पूरा अंग प्रिंट कर सकते हैं।

भविष्य में क्या है?

3डी बायोप्रिंटिंग में पुनरुत्पादन चिकित्सा (रीजेनेरेटिव मेडिसिन) के लिए जबरदस्त संभावनाएं हैं। हम अभी सफलतापूर्वक स्टेम सेल्स का कल्चर कर पा रहे हैं और उनकी मदद से मानव ऊतक बना पा रहे हैं। इस तकनीक की मदद से अब हम कुछ हद तक तंत्रिका क्षति (नर्व डैमेज) को भी सुधार सकते हैं।

जनवरी 2018 में 3डी बायोप्रिंटिंग तकनीक ने बहुत अप्रत्याशित ढंग से एक 22 वर्षीय महिला के जीवन को बचाने में योगदान दिया। जब दुबई में डॉक्टरों ने इस महिला के पिता की जांच की जो कि उसे किडनी दे रहे थे तो उन्होंने पाया कि उनकी किडनी में एक कैंसरकारक गांठ थी। स्वाभाविक रूप से ऐसे में वे उस किडनी को ट्रांसप्लांट नहीं कर सकते थे।

भविष्य में, जटिल वैस्कुलर सिस्टम के साथ पूर्ण अंगों की प्रिंटिंग संभव होगी और लाखों मरीजों के लिए अंग उपलब्ध होंगे जो किडनी प्रत्यारोपण, हृदय प्रत्यारोपण, लिवर प्रत्यारोपण और फेफडा प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा सूची में हैं।

केवल यह ही नहीं, खास तरह से प्रिंटेड रिप्लेसमेंट अंग किसी भी प्राप्तकर्ता के लिए बेहतरीन होंगे। इसका मतलब यह है कि जिस मरीज को अंग लगाया जाएगा वह किसी भी तरह की चिंता से मुक्त रहेगा। अंगों के स्वीकार न हो पाने के मामले भी बहुत कम हो जाएंगे।

एडवांस्ड 3डी बायोप्रिंटिंग शरीर के नए अंग और मॉडल अंग बनाने में भी सहायक होगी। अप्रैल 2019 में वैज्ञानिक एन. सिगॉक्स, एल पोर्चेट, पी. ब्रेटोना और एस ब्रॉसेट इट अल ने स्टोमेटोलोजी, ओरल और मैक्सीलोफेशियल सर्जरी के पत्र में लिखा, 'कभी संवहन की प्रक्रिया में जो बाधा थी उसे अब पार कर लिया गया है, अंगों और किसी भी आकार के ऊतक (टिश्यूज़) की प्रिंटिंग संभव हो गई है, इसने व्यक्ति विशेष के हिसाब से मेडिसिन आधारित मेडिकल इमेजिंग के दरवाजे खोल दिए हैं। जरूरत के हिसाब से प्रिंटिंग के कारण डोनर या दाता की तरफ से मिलने वाले रोग कम हो गए हैं और बनावट संबंधी नतीजे भी बेहतर हो गए हैं।"


क्या चुनौतियां हैं?

अंगों का आकार बनाकर रखना और वातावरण को बनाने से अंगों के विकास में मदद मिलती है। यही पहले सबसे बड़ी बाधा थी। हल यह है कि एक ठीक बायोलिंक बनाई जाए। सैद्धांतिक रूप से 3डी बायोप्रिंटिंग में अंग प्रत्यारोपण की व्यापक संभावनाएं हैं। असल में ये अंग शरीर के भीतर कैसे काम करेंगे इसका प्रयोग वैज्ञानिकों द्वारा किया जाना बाकी है।

तेल अवीव यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक पूर्ण मानव हृदय का बायोप्रिंट की कुछ चुनौतियों को पार कर लिया है। और इसीलिए अप्रैल मध्य में भारत और दुनिया के लोगों का ध्यान उनकी तरफ गया। एक बार जब वैज्ञानिक असल आकार के अंग प्रिंट करने लगेंगे तो चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति हो जाएगी।


इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें- https://www.myupchar.com/en/disease/heart-transplant

स्वास्थ्य आलेख www.myUpchar.com द्वारा लिखे गए हैं, जो सेहत संबंधी भरोसेमंद जानकारी प्रदान करने वाला देश का सबसे बड़ा स्रोत है।

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